जानिये बकरी के दूध के लाभ और किन स्थितियों में यह गाय के दूध से भी ज्यादा लाभकारी होता है ।

बकरी के दूध के स्वास्थ्य लाभ

🌼आयुर्वेद में दूध का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान   है यह आहार के रूप में, तेल और कई औषधियों के निर्माण में ,खनिजों के शुद्धिकरण और   कई औषधियों के साथ अनुपान के रूप में भी दिया  जाता है।🌱

🌼आयुर्वेद में 8 अलग-अलग जानवरों के दूध के फायदे बताए गए हैं।

🌼बकरी का दूध एक ऐसा दूध है जो कई स्थितियों में बेहद उपयोगी है लेकिन यह बहुत कम लोकप्रिय है, आजकल इसके स्वास्थ्य लाभों के बारे में अनभिज्ञता के कारण इसका उपयोग बहुत सीमित हो गया है।

🌼मुझे आशा है कि बकरी के दूध के बारे में रोचक और उपयोगी तथ्य जानकर आप इसे अपने आहार में शामिल जरूर करेंगे।

1. संरचना में यह मानव दूध के करीब है🌱
– आपको जानकर हैरानी होगी कि बकरी का दूध गाय के दूध की तुलना में मानव स्तन के दूध के समान होता है जो इसे शिशुओं और बच्चों के उपयोग के लिए उपयुक्त बनाता है।
2. इसे पचाना आसान होता है🌱
– बकरी के दूध में ए 2 प्रोटीन होता है जो पचने में आसान होता है।
-इसमें लैक्टोज कम होता है जो इसे पचने में हल्का बनाता है।
-यह बहुत छोटे वसा कणों से बना होता है जिसे शरीर द्वारा तोड़ना और आत्मसात करना आसान होता है।
-चूंकि इसमें वसा का अणु छोटा होता है, यह जल्दी पचता है और जल्दी ऊर्जा देता है।

3.खनिजों से भरपूर🌱
-बकरी के दूध के खनिज गाय के दूध की तुलना में पचाने में आसान और कोशिकाओं के लिए अवशोषित करने में आसान होते हैं।☘️
– बकरी के दूध का कैल्शियम अवशोषित करना आसान होता है और बकरी का दूध पाचन तंत्र द्वारा आयरन और कॉपर के अवशोषण को भी बढ़ाता है इसलिए यह शरीर मे इन खनिजो की  कमी होने से भी बचाता है।☘️

-यह पोषक तत्वों के खराब अवशोषण को रोकता है।☘️
-इसमें सेलेनियम होता है जो इम्युनिटी में सुधार करता है और संक्रमण से बचाता है☘️
-यह थायराइड ग्रंथि के उचित कार्य में मदद करता है क्योंकि बकरी के दूध में मौजूद सेलेनियम और आयोडीन का उपयोग थायरॉयड ग्रंथि द्वारा हार्मोन बनाने के लिए किया जाता है।☘️

-इसमें पोटेशियम का उच्च स्तर होता है जो वासोडिलेशन का कारण बनता है और रक्तचाप को कम करता है

4. प्रतिरक्षा में सुधार करता है🌱
-बकरी का दूध आंत में अनुकूल बैक्टीरिया को बनाए रखने में मदद करता है जो उचित पाचन में मदद करता है और प्रतिरक्षा में सुधार करता है।

5. संक्रमणों को रोकें और उनको ठीक करने में सहयोगी🌱
-इसमें एंटी बैक्टीरियल, एंटी फंगल, एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं इसलिए यह निमोनिया, तपेदिक, हैजा, यूटीआई, साइनसाइटिस आदि जैसी बीमारियों को रोक सकता है।

6.वजन घटाने में मदद करता है🌱
जो लोग अपना वजन कम करना चाहते हैं उनके लिए यह गाय के दूध से भी बेहतर है क्योंकि इसमें दूध वसा ग्लोब्यूल झिल्ली (एमएफजीएम) होता है जो वजन घटाने में मदद करता है और इंसुलिन प्रतिरोध को कम करता है।
7. दिल की सेहत के लिए अच्छा🌱
❤️यह कोलेस्ट्रॉल को कम करता है, यह अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करता है

-रक्तचाप को नियंत्रित करता है।

8.यह जोड़ों के लिए अच्छा है
यह लंबी आयु देता है, चपलता देता है।

9.त्वचा के स्वास्थ्य में सुधार करता है🌱

इसका आंतरिक और बाहरी उपयोग दोनों त्वचा के लिए अच्छा है
-यह रंग में सुधार करता है, मुंहासों को ठीक करने में मद्दत करता है और त्वचा को कोमल बनाता है।🌷

-यह विटामिन ए, विटामिन सी और विटामिन ई जैसे शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट में समृद्ध है। ये हमारे शरीर में मुक्त कणों के कारण होने वाले ऑक्सीडेटिव नुकसान को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो झुर्रियों और महीन रेखाओं के होने  में योगदान करते हैं।🌷
बकरी का दूध मृत कोशिकाओं को हटाता है और नीचे की नई कोशिका परतों को प्रकट करता है, इस प्रकार झुर्रियों, महीन रेखाओं, सनस्पॉट की उपस्थिति आदि को कम करता है।🌷

10. यह प्रकृति में शोषक है जो इसे आईबीएस और दस्त की स्थिति में सहायक बनाता है।🌷

👉पाचन, फेफड़े, हृदय, हड्डी और त्वचा के स्वास्थ्य में सुधार के लिए बकरी के दूध का सेवन अवश्य करें।

10 interesting facts about goat milk.

Health benefits of goat’s milk

🌼In Ayurveda milk is very important part of diet, in preparation of oils and many medicines, purification of minerals and milk is also used as co drink for many medicines .

🌼Benifits of milk of 8 different animals are described in Ayurveda.

🌼Goat milk is one such milk which is immensely useful in many conditions but it is much less popular, now a days its usage is very limited due unawareness about its health benefits.

🌼I hope by knowing interesting facts about goat milk you might include it in your diet.

1. In composition it is close to human milk👍
– You will be surprised to know that goat milk is much more similar to human breast milk than cow milk which makes it suitable for use for infants and children .🌹

2. It is easy to digest👍
– Goat milk  contain A 2 protein which is easy to digest.
-It contains less lactose which makes it light to digest.
-It is made up up of much smaller fat particles which is easy to break and assimilate by body.
-As it has smaller fat molecule it digest early and gives energy quickly.

3.Rich in minerals
-Goats milk minerals are more easy to digest and easy for cells to absorb than cow milk.☘️
– calcium of goats milk is easier to absorb and goat milk also increase iron and copper absorbtion by digestive tract so it prevents there deficiency.☘️

-It prevents mal absorbtion of nutrients.☘️

-It contains selenium which improves immunity and protect from infections☘️
-It helps in proper thyroid gland function as selenium and iodine which is there in goat milk is used by thyroid gland to make its hormones.☘️

-It contains high level of potassium which cause vasodilation and reduce blood pressure

4.Improves immunity
-Goat milk helps in maintaining friendly bacteria in gut which helps in proper digestion and improves immunity.

5.Prevent and treat infections
-It has anti bacterial, anti fungal, anti microbial properties so it can prevent may diseases like pneumonia, tuberculosis, cholera, uti, sinusitis etc.

6.Helps in weight loss
😎It is better than even cow milk for those who want to lose weight as it contains milk fat globule membrane (MFGMs) which helps in weight loss and reduces insulin resistance.

7.Good for heart health
❤️It lowers cholesterol, it increases good cholesterol and reduces bad cholesterol

-Controls blood pressure.

8.It is good for joints
It gives logivity, gives agility.

9.Improves skin health

Both it’s internal and external use is good for skin
-It improves complexion, fight acne and makes skin soft.🌷🌷

-It is rich in powerful antioxidants, such as vitamin A, vitamin C, and vitamin E.These play a vital role in preventing the oxidative damages caused by free radicals in our body, which contribute to the appearance of wrinkles and fine lines.

-Goat milk removes dead cells and reveals new cell layers underneath, thus, reducing wrinkles, fine lines, the appearance of sunspots, etc.

10. It is absorbent in nature which make it helpful in condition of IBS and diarrhea.

👉Must try goat’s milk to improve digestive, lungs, heart , bone and skin health.

मक्खन है बच्चों के लिये बहुत सेहतमन्द।इसे कैसे बनाए और इसके स्वास्थ्य लाभ जाने।

*मक्खन *

अपने बच्चों👶को स्वस्थ💪 और बुद्धिमान बनाने के लिए उनको ताजा मक्खन देवें।😇. यह बच्चों की लंबाई⛹️‍♂️और स्वास्थ्य🤸‍♂️को सुधारता है। अतिसक्रिय (चंचल) बच्चों के लिए अच्छा होता है।🤗

मक्खन को कैसे बनाए?❓

🌷दूध की मलाई को प्रतिदिन फ्रीज में इकट्ठा करें और जब यह 250 ग्राम एकत्रित हो जाए तो इसमें दही मिला कर रात भर के लिए छोड़ दें।🌜अगले दिन इस मिश्रण को 15 से 20 मिनट के लिए मिक्सर में मिक्स करे जब तक कि ठोस भाग अलग न हो जाए। इसमें थोड़ा पानी डालकर मिक्स किया जा सकता है। मिक्स करने के बाद जो तरल भाग होता है वह छाछ है और शेष ठोस भाग मक्खन है। इस तरह एकदम ताजा मक्खन😋 तैयार है।🐂

मक्खन के लाभ या फायदे🌞

🌷मक्खन पचाने में हल्का होता है। पाचन तंत्र को मजबूत करता है और प्रकृति में ठंडा होता है।

🌷मक्खन दिल💓, आंखों,👀 त्वचा, बालों 👧और हड्डियों🦵के लिए अच्छा होता है।

🌷मेधा – यह बुद्धि को बढ़ाता है।

🌷बवासीर, लकवा, मांसपेशियों की सूजन, सूखी खांसी, रक्तस्राव विकार, जलन🥵, अल्सर, वजन कम होना, कमजोरी, अति चिंतन😳और अत्यधिक क्रोध आना😠जैसी समस्याओं में इसे अपने प्रतिदिन आहार में अवश्य शामिल करना चाहिए।

🌷त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए इसको त्वचा पर भी लगाया जा सकता है।😎. पिंपल्स और दागों को हटाता है। बच्चों की मालिश के लिए भी उपयोग किया जाता है।👶

नोट👇
🌷खट्टा, पुराना या जिससे बदबू आए वो मक्खन इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।❌
🌷मोटे व्यक्ति को इसे खाने से बचना चाहिए।❌
🌷सीधे दूध की मलाई से मक्खन नहीं बनाना चाहिए।❌

केला कब,किन्हें और किन्हें नही खाना चाहिये?

केला या कदली🍌

🌷संस्कृत में कादली का दूसरा नाम अमृत है, जो इसके महत्व को दर्शाता है।

🌷केले का पौधा उन पौधों में से एक है जिसके सभी हिस्से (भाग) उपयोगी होते है।

🌷इसका पका हुआ फल सबसे सस्ता, आसानी से उपलब्ध और स्वादिष्ट फल होता है।

🌷केले की कई किस्में हैं जो आकार और रंग में भिन्न होती हैं। स्थानीय स्तर पर उगाएं गए केले का उपभोग करे।छोटे ,विष्ट खुशबू वाले केले खाने के लिये श्रेष्ट होते है

🌷इसके पके हुए फल के अतिरिक्त इसके कच्चे फल, तना और पुष्पक्रम (Inflorescence) को सब्जियों के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके पत्तों का भोजन परोसने के लिए उपयोग किया जाता है।

🌷हमारे देश में केले के पौधे की पूजा भी की जाती है क्योंकि यह केवल हमे देता है और बदले में कुछ नहीं मांगता है।

🌷केले का फल सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के लिए (बच्चो से बूढों तक) लाभकारी होता है।

🌷केले का पका हुआ फल स्वाद में मीठा और कसैला होता है। पचने में भारी और स्निग्ध (Unctuous) होता है। यह वात और पित्त दोष को शांत करता है तथा कफ दोष को बढ़ाता है। यह प्रकृति में ठंडा होता है।

🌺केले के फायदे या लाभ

✅यह उन लोगों के लिए अच्छा है जिनका पाचन तंत्र या पाचन की अग्नि मजबूत होती है या वे व्यक्ति जिनको हर समय भूख महसूस होती हैं। यह भूख और प्यास दोनों को शांत करता है।

✅इसका सेवन सामान्य कमजोरी में करने से यह शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है।

✅यह पित्त विकारों में उपयोगी होता है। जैसे
👉gastritis
👉शरीर, हथेली और पैरों में जलन,
👉शरीर में अत्यधिक गर्मी होना,
👉अत्यधिक पसीना आना,
👉अत्यधिक गुस्सा आना, और
👉रक्तस्राव विकारों जैसे नाक से खून आना, गुदा से रक्त आना या माहवारी में अधिक रक्तस्राव होना।

✅यह वात विकारों में भी लाभकारी है। जैसे
👉कमजोरी,
👉सूखी खांसी,
👉दुर्बलता,
👉मांसपेशियों में कमजोरी,
👉 मांसपेशियों का कुपोषण या दुर्विकास,
👉अतिसक्रियता (Hyperactivity), और
👉अत्यधिक विचारो का आना (मन का अशांत रहना)।

✅ यह रक्त को शुद्ध करता है।

✅यह बालों के विकास के लिए अच्छा है।

✅केला उन व्यक्तियों के लिए अति आवश्यक है जो भारी कसरत करते है और मजबूत शरीर का निर्माण करना चाहते है।

✅यह मस्तिष्क के लिए टॉनिक का कार्य करता है और तनाव, चिंता से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।

✅यह कीड़ों के संक्रमण से राहत दिलाता है।

✅यह मधुमेह से पीड़ित ऐसे व्यक्तियों के लिए अच्छा है जिनका वजन घटता जा रहा है।

✅जिन व्यक्तियों को उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) है उन्हें इस अवश्य खाना चाहिए।

✅इसके तने का रस गुर्दे में पथरी और मूत्र में जलन होने पर अत्यधिक लाभकारी होता है।

✅इसका फूल HyperAcidity में उपयोगी होता है।

✅कच्चा केला स्वाद में कसैला होता है। यह दस्त, IBS, पेट में गैस बनना और सूजन में उपयोगी है। इसे पकाने के लिए घी का उपयोग करना बेहतर होता है।

✅रूसी या Dermatitis में इसके पत्तों को रस लगाना लाभकारी होता है।

✅सूखी त्वचा और सूखे बाल हो तो उसपर पके हुए केले का पेस्ट लगाना उत्तम होता है।

✅यह कई स्त्रीरोगो में उपयोगी होता है। जैसे प्रदर (Leucorrhoea), अत्यधिक रक्तस्राव, कमजोर गर्भाशय आदि।

✅यह शुक्राणुओं (Sperm) की मात्रा और गुणवत्ता को भी बढ़ाता है।

🤔क्या केले का मिल्क शेक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है??

🌻नहीं। आयुर्वेद के अनुसार केला और दूध दोनों ही पचाने के लिए भारी होते हैं। दोनों का साथ में सेवन करने से यह पाचन तंत्र की अग्नि को धीमा कर देते हैं, इसलिए संयोजन (Combination) के सेवन से बचना चाहिए।❌

🧐 केला और दही साथ में लेना चाहिए??*

इस संयोजन (Combination) से भी परहेज़ करना चाहिए।❌

केले से परहेज़ कब करना चाहिए??

👉खांसी, सर्दी, दमा, अपच और पाचन शक्ति कम होने के दौरान।
👉 केला खाने के तुरंत बाद पानी पीने से बचना चाहिए।

केले का सेवन कब करना चाहिए??

🌺कफ समय को छोड़कर(प्रातः 6 बजे से 10 बजे तक और रात्रि 6 बजे से 10 बजे तक) इसका सेवन किया जा सकता है।
🌺जिस व्यक्ति का पाचन तंत्र मजबूत होता है वह कभी भी केले का सेवन कर सकता है।

🤔 केले की चोटी किस्म ही क्यों अच्छी है??
👉केले की छोटी किस्म शरीर की नलिकाओं को बंद नहीं करती है, लेकिन आजकल हर जगह उपलब्ध बड़ी किस्म के केले से हर तरह से बचना चाहिए क्योंकि वे पचने में भारी होते हैं, ठंडे होते हैं और शरीर के चैनलों को अवरुद्ध करते हैं। केले का नियमित सेवन पाचन अग्नि को नम करता है जो सभी रोगों के लिए जिम्मेदार है।

नोट– यदि अधिक मात्रा में केले का सेवन करने से अपच हो जाता है तो घी और सोठ के उपयोग से राहत मिलती है।

अद्रव्य चिकित्सा- दवा के उपयोग बिना उपचार ।

अद्रव्य चिकित्सा

अद्रव्य चिकित्सा उपचार का ऐसा प्रकार है जिसमें किसी भी दवा का उपयोग शामिल नहीं  होता है।

आयुर्वेद में दो प्रकार के उपचार होते हैं जिनमें एक दवा का उपयोग होता है जिसे द्रव्य चिकित्सा के रूप में जाना जाता है और दूसरा जिसके लिए किसी दवा या पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती है उसे अद्रव्य चिकित्सा के रूप में जाना जाता है।

अद्रव्य चिकित्सा बहुत ही महत्वपूर्ण, उपयोगी और रोचक प्रकार का उपचार है जिसका उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है लेकिन कई बार लोग इसके महत्व को नहीं समझते हैं जैसे आयुर्वेदिक चिकित्सक कभी आपकी समस्या सिर्फ  सुनते  और दवाएं नही देते हैं लेकिन दवाओं के साथ वे आपको आहार, जीवन शैली और कुछ सुझाव भी देते हैं जो बेहतर परिणाम के लिए और उसी समस्या की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए गैर औषधीय उपचार के अंतर्गत आता है।

तो इस अद्रव्य चिकित्सा में कई अलग-अलग प्रकार की विधियों का उपयोग किया जाता है जो शारीरिक गतिविधियाँ, परामर्श, ध्यान, आध्यात्मिक गतिविधियाँ, धार्मिक गतिविधियाँ आदि हो सकती हैं।

यह मुख्य उपचार हो सकता है या इसका उपयोग दवाओं के साथ किया जा सकता है।

बिना दवाई के रोग कैसे ठीक हो सकते हैं?

आयुर्वेद के अनुसार कुछ भी जो दोषों के संतुलन को वापस लाता है वह उपचार है इसलिए जरूरी नहीं कि केवल दवाएं ही दोषों का संतुलन लाती हैं, बल्कि कोई भी गतिविधि, विचार, भावना आदि जो संतुलन लाती है, उपचार की श्रेणी में आती है जैसे मोटापा, मधुमेह में व्यायाम या चलना ️ मौखिक औषधियों जितना ही महत्वपूर्ण है उसी प्रकार मानसिक विकारों में साहस, सकारात्मक दृष्टिकोण, परामर्श के माध्यम से आत्मविश्वास प्रदान करना उपचार का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है।

आश्वासन भी इलाज का काम करता है狼

इसके अलावा द्रव्य चिकित्सा के लिए किसी दवा की आवश्यकता नहीं होती है, यह लागत प्रभावी है।

अद्रव्य चिकित्सा कई स्थितियों में बहुत प्रभावी और उपयोगी है।

इसका उपयोग शारीरिक और मानसिक दोनों विकारों में किया जा सकता है। इसका उपयोग अकेले या दवाओं के संयोजन में किया जा सकता है।

यह बीमारियों को ठीक करने के लिए नहीं बल्कि बीमारियों को रोकने के लिए भी उपयोगी है जैसे आयुर्वेदिक दैनिक दिनचर्या, मौसमी दिनचर्या और सद्वृत्त का पालन करने   से  रोगों से बचा जा  सकता है।

कौन-सी विधियाँ अद्रव्यभूत चिकित्सा की श्रेणी में आती हैं?

आयुर्वेदिक दैनिक दिनचर्या और मौसमी दिनचर्या का पालन करना।

प्राकृतिक आग्रह जैसे माल,मूत्र,झीक,जम्भाई आदि के वेग  को नहीं रोकना।

उपवास (कफ दोष में)।

प्यास को नियंत्रित करना।

ध्यान (मन के सत्व की वृद्धि)।

मंत्रों का प्रयोग या पवित्र जप (मानसिक शक्ति देता है)।

आध्यात्मिक ज्ञान (स्पष्टता देता है)।

योग

व्यायाम

मर्म चिकित्सा

सूर्य के प्रकाश के संपर्क आना

विभिन्न स्थितियों में गर्म या ठंडे पानी से स्नान करना

विश्राम करना

प्रकृति में समय बिताना जैसे बगीचों में, जल निकायों के पास आदि।

चंद्रमा प्रकाश में समय बिताना

हवा के संपर्क में आना

अनुष्ठानों का पालन

बलिदान

मनोवैज्ञानिक समस्याओं में भय, सदमा, भूलना, नींद को प्रेरित करना,  स्पर्श, परामर्श, प्रोत्साहन, डराना, प्रशंसा करना आदि उपचार के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

अच्छी मित्रो के साथ समय बिताना।

अच्छे नैतिक आचरण जैसे करुणा, सच्चाई, अहिंसा आदि का पालन करने से व्यक्ति को मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद मिलती है।

ब्रह्मचर्य पालन

इंद्रियों और नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण। इससे मन का सत्व गुणवत्ता बढ़ता है जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रोकथाम और इलाज में मदद करते है।

तो यह स्पष्ट है कि दवाओं के बिना कुछ बीमारियों को ठीक किया जा सकता है और स्वास्थ्य को बनाए रखा जा सकता है।

आद्रव्य चिकित्सा के बारे में अधिक जानें और वैद्य के मार्गदर्शन में इसका उपयोग करें।

Adravya chikitsa (non pharmacological treatment) – its a type of treatment which do not require use of any medicines or other substance.

Adravya chikitsa – treatment without use of medicines.

Adravya chikitsa.

🌻Treatment which do not involve use of any medicines is adravya chikitsa.

🌻There are two types of treatments in Ayurveda one which involves use of medicines is known as Dravya chikitsa and other which do not require any medicines or substance is known as Adravya chikitsa.

🌻Adravya chikitsa is very important, useful and interesting type of treatment which is used in Ayurveda but many times people do not understand its importance like Ayurvedic doctor never just hear your problem and give medicines but along with medicines they suggest you diet, lifestyle and some counselling which comes under non pharmacological treatment for better result and to prevent recurrence of same problem.

🌻So in this adhravyabhut chikitsa many different types methods are used which may be  physical activities, counselling, meditation, spiritual activities, religious activities etc.

🌻It can be main treatment or it can be used along with medicines.

🤔How without medicines diseases can be cured?

👉As per Ayurveda anything which brings back balance of doshas is treatment so  not necessarily only drugs which brings balance of doshas considered as treatment but any activity, thought, emotion etc which brings balance comes under category of treatment like in obesity, diabetes exercise or walking🏃⛹️🚴 is as important as oral medicines similarly in mental disorders instilling courage, positive attitude, confidence through counselling is very important part of treatment😇 .

🌻Even assurance works as treatment🤫.

🌻Also as adravya chikitsa do not require any drug it is cost effective😍.

🌻Adravya chikitsa is very effective and useful in many conditions .

🌻It can be used in both physical and mental disorders. It can be used alone or in combination with medicines.🌷

🌻It not used to cure diseases but also to prevent diseases like following Ayurvedic daily routine, seasonal routine and sadvritta one can prevent diseases.🌹

🤔What methods comes under category of adhravyabhut chikitsa?

👉Following Ayurvedic Daily routine and seasonal routine.

👉Not holding Natural urges

👉Fasting(in kapha dosha)

👉Controlling thirst

👉Meditation(increase sattva of mind)


👉Use of mantras or holy chanting(gives mental strength)

👉Spiritual knowledge(gives clarity)

👉Yoga

👉Exercise

👉Marma chikitsa

👉Exposure to  sun light

👉Bath with hot or cold water in different conditions

👉Spending time in nature like in gardens, near water bodies etc.

👉Exposure to moon light

👉Exposure to wind

👉Following rituals

👉Oblation

👉In psychological problems fear, shock,making one to forgot, inducing sleep, gental touch, counselling, encouragement,frightening, praising etc are used as treatment

👉Spending time with good company.

👉Following good moral conduct like compassion, truthfulness, non violence etc helps person in maintaining mental and social health.

👉Following celibacy

👉Control over senses and negative emotions. This increases sattva quality of mind which helps in prevention and cure of psychological problems

🌻So it is clear that without medications some diseases can be cured and health can be maintained .

🙏Know more about adravya chikitsa and use it under the guidance of Vaidya.

अभ्यंग (मालिश) से शारीरिक और मानसिक रोग रहे दूर, साथ ही मिलती है सुंदर त्वचा और मजबूत अस्थियां। कब, कैसे करे अभ्यंग पूरी जानकारी।

अभ्यंग या मालिश आयुर्वेदिक दिनचर्या का हिस्सा है।

🌞अभ्यांग सब उम्र के लोग और हर मौसम में हर रोज कर सकते है।

🌞नहाने से पहले रोजाना मालिश या अभ्यंग  करें इसमें सिर्फ 15 मिनट या कम से कम 5 मिनट का समय लगता है।

🌞तेल को संस्कृत में स्नेह कहा जाता है इसलिए अभ्यंग स्वयं को स्नेह देने जैसा है।

🌞अभ्यंग न केवल त्वचा के लिए अच्छा है बल्कि यह पूरे शरीर प्रणाली के लिए फायदेमंद है इसलिए यह आयुर्वेदिक उपचार का अभिन्न अंग है।

🌞यह स्वस्थ स्थिती के साथ-साथ कई रोग की  स्थितियों में उपयोगी है।

🌷अभ्यंग के लाभ

👉यह हड्डी, मांसपेशियों, टेंडॉन्स और स्नायुबंधन को मजबूत करता है।

👉यह शरीर की ताकत और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

👉यह गठिया, स्पॉन्डिलाइटिस और अन्य जोड़ों के विकारों को रोकता है।

👉यह जोड़ों को चिकनाई देता है, मांसपेशियां अच्छी तरह से टोंड और मजबूत होती हैं।

👉यह शारीरिक और मानसिक तनाव का प्रतिरोध करता है।
👉यह विधि शरीर में खनिजों और पोषक तत्वों को त्वचा के माध्यम से पहुचती है ।

👉यह त्वचा की गुणवत्ता और रंगत में सुधार करता है। ️

👉अभ्यंग से शरीर से विषाक्त पदार्थों बाहर निकल जाते है।

👉नींद की गुणवत्ता में सुधार करता है।

👉दृष्टि में सुधार होता है।

👉बाल मुलायम, चमकदार और घने हो जाते हैं।

👉नियमित अभ्यंग से झुर्रियों नही आती है।

👉शरीर और दिमाग को आराम मिलता है। यह एक स्ट्रेस बस्टर है और मानसिक स्पष्टता देता है।

👉सर्वश्रेष्ठ एंटी एजिंग है।

🤔अभ्यंग  कैसे करें?

👉किसी प्याले में तेल लेकर थोड़ा गर्म कर लीजिए (गर्मी में गर्म करने की जरूरत नहीं है) फिर बैठ जाएं या आरामदेह जगह पर खड़े हो जाएं और मालिश निम्न प्रकार से शुरू करें

🌼खोपड़ी – उँगलियों की नोक से गोलाकार गति में तेल लगाएं।
🌼माथा- उंगलियों के अग्रिम भागे से माथे के बीच से बाहर की ओर मालिश करे।
🌼चेहरा पर ऊपर की दिशा में गोलाकार गति में अभ्यंग करे।
🌼कान पर तेल लगाए।
🌼गर्दन के आगे और पीछे अभ्यंग करे।
🌼छाती और पेट दक्षिणावर्त दिशा में अभ्यंग करे।
🌼हाथ और पैर – नीचे की दिशा में लंबे स्टोक्स और जोड़ों पर गोलाकार गति से तेल लगाए।
🌼कमर और पीठ पर  – बीच  से बाहर की ओर अभ्यंग करे।
🌼अंत में  पैरो पर तेल लगाए।

👉5-10 मिनट के लिए तेल छोड़ दें फिर गुनगुने पानी से नहा लें।

🤔अभ्यंग के लिये कौन सा तेल इस्तेमाल करें?
👉अपनी प्रकृति (शरीर के प्रकार) के अनुसार तेल चुनें।
👉तिल का तेल हर कोई इस्तेमाल कर सकता है।
️ 👉दर्द में महानारायण तेल का प्रयोग करें और तनाव में ब्राह्मी तेल का प्रयोग करें।

🤔सेल्फ मसाज के लिए सबसे अच्छा समय ??

👉सुबह नहाने से पहले। रात में पैरों की मालिश करें।

🤔मालिश से कब बचें?

👉अपच और बीमारी में।
👉मासिक धर्म के दौरान हल्की मालिश की सलाह दी जाती है।
👉गर्भावस्था में भी स्वयं की हल्के हाथ से  मालिश की जा सकती है इससे गर्भावस्था में होने वाले  दर्द, खिंचाव के निशान, खुजली और त्वचा की मलिनकिरण को रोका जा सकता है।

🌻अभ्यंग एक ऐसी विधि है जिससे बिना कुछ खाए शरीर को पोषण और बल मिलता है। इसे जरूर करे और स्वस्थ्य रहे।🌱

अचार खाए या नहीं?

अचार

🌺 अचार, किण्वन (Fermentation) के माध्यम से स्वाभाविक रूप से भोजन को संरक्षित करने का एक पारंपरिक तरीका है। 😋

🌺 मौसमी फल और सब्जियों को अचार बनाने के लिए चुना जाता है ताकि इनके स्वाद का पूरे वर्ष आनंद लिए का सके ।👌

🌺 रेगिस्तानी भूमि में जहाँ सब्जियाँ की पैदावार और उपलब्धता कम होती है वहां अचार एक अच्छा विकल्प है।

🌺 प्राचीन काल में जब एक जगह से दूसरी जगह जाने में कई दिन लग जाते थे तो लोग अचार अपने साथ ले जाते थे जो खराब नहीं होता था।👍

🌺 हम भारतीयों के लिए अचार हमारी संस्कृति का अविभाज्य हिस्सा है। 😀

🌺 तीखा, खट्टा (Tangy) अचार खाने में स्वाद को बढ़ाता है। अचार सूंघने और देखने से लार का स्त्राव होने लगता है जो पाचन के लिए अच्छा है। 😋

🌺 इसमें 6 रस होते हैं। यह मसालेदार, तीखा और प्रकृति में गर्म होता है। यह सभी तीन दोषों को बढ़ाता है।

🌺 ये विटामिन सी से भरपूर होता है। आंत में अच्छे जीवाणुओं के विकास में मदद करता है। 😎

🌺 अचार बनाने के लिए सब्जियों, फलों और यहां तक ​​कि मांस का उपयोग भी किया जाता है।

🌺 अचार में बहुत सारे मसालों का उपयोग किया जाता है जो पाचन तंत्र में सुधार करने में सहायक होते है। ☺️

🌺 केवल घर के बने अचार का ही उपयोग करें। इसमें आप अपनी आवश्यकता के अनुसार सामग्री डाल सकते हैं जैसे कि सूजन के लिए हिंग, दर्द के लिए मेथीदाना और मधुमेह के लिए आंवला ,हल्दी आदि।

🌺 बाजार के बने अचार में सिरके और अन्य संरक्षक तत्वों (Vinegar and Other Preservatives) को मिलाया जाता है जिसके इस्तेमाल में किए जाने वाले तेल और मसालों की गुणवत्ता के बारे में सुनिश्चित होना कठिन होता है।

🌺 अचार का सेवन कम मात्रा में ही करें। इसे सब्जी की तरह न खाएं। ❎

🌺 इसे रोजाना न खाएं। ❎

🌺 अम्लता (Acidity), रक्तस्राव विकारों, अपच, IBS, उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) और सिरदर्द में इसके सेवन से बचें। ❎

🌺 बच्चों और बूढ़े लोगों को इसके सेवन से बचना चाहिए। ❎

🌺 यह प्रकृति में राजसिक और तामसिक है, इसलिए इसे सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए।

Pickles are good or bad ?

Achar(Pickle)

🌺Pickling is a traditional method of preserving food naturally through fermentation . 😋

🌺Seasonal fruits and vegetables are pickled so that they can be relished through out the year.👌

🌺In desert land where less vegetables are available pickles are good option.

🌺In Ancient times when traveling to one place to another takes many days, people used to carry pickles with them which do not got spoiled.👍

🌺 For us pickles are inseparable part of our culture. 😀

🌺Tangy pickles improves taste in food, from smell and seeing achar saliva secrets.😋

🌺It Contains 6 rasa. Spicy, piercing and hot in nature. It increases all 3 doshas.

🌺Rich in vitamin C. Helps in growth of good bacteria in intestine. 😎

🌺 Vegetables, fruits and even meat are used to make pickles.

🌺 Use of lot of spices in pickle helps in improving digestion. ☺️

🌺 Use only homemade achar, you can add ingredients as your requirement like hing for bloating, methidana for pain and amla for diabetes.

🌺 In market pickles vinegar and other preservatives are added,not sure about quality of oil and spices used.

🌺 Eat achar only in small amount, do not eat it like sabji.❎

🌺 Do not eat it on daily basis.❎

🌺 Avoid it in acidity,bleeding disorders, Indigestion, IBS, high blood pressure and headache.❎

🌺 children and old people should avoid it. ❎

🌺 It is rajasic and tamasic in nature, so take it in limited amount.

सिंघडा है पोषक तत्वों से भरपूर,किन परिस्थितियों में है यह उपयोगी?किन्हें इसे नही खाना चाहिये?पूरी जानकारी

सिंघाड़ा (Water Chestnut) को श्रृंगटक के रूप में भी जाना जाता है। इसके फलों पर काँटा शृंग (सींग) जैसा होता है इसलिए इसे संस्कृत में श्रृंगटक के नाम से जाना जाता है। यह एक कंद है जो पानी में उगता है। इसके कई स्वास्थ्य लाभों के कारण इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है।

☘️यह स्वाद में मीठा और कसैला होता है। प्रकृति में भारी और सूखा। शक्ति में ठंडा और पित्त दोष को संतुलित करता है।

☘️यह प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और खनिजों (कैल्शियम, फास्फोरस, सल्फर, आयोडीन सोडियम, मैग्नीशियम और आयरन आदि) से भरपूर है। भारत में उपवास के दौरान इसका उपयोग किया जाता है क्युकी यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है।

☘️मांसपेशियों की कमजोरी में यह पोषण पूरक के रूप में उपयोग किया जाता है। यह शरीर को ताकत देता है। 💪

☘️ यह वजन कम करने में मदद करता है लेकिन कम मात्रा में इसका उपयोग करना चाहिए।

☘️यह शक्ति में ठंडा होता है इसलिए रक्तस्राव विकारों (नाक से खून बहना, माहवारी में अधिक रक्तस्राव होना) और जलन, Gastritis या मूत्र में जलन की समस्या, मूत्र प्रतिधारण और अत्यधिक प्यास लगने में उपयोग किया जाता है।

☘️दस्त और IBS में उपयोगी।

☘️दिल के लिए अच्छा होता है। रक्तचाप को नियंत्रित करता है।

☘️महिलाओं की प्रजनन क्षमता में वृद्धि, गर्भधारण में सहायक, गर्भपात को रोकना, बच्चे को स्वस्थ और मजबूत बनाना, स्तनों में दूध बढ़ाने में उपयोगी होता है।

☘️थायराइड की समस्याओं में उपयोगी।

☘️शुक्राणु की मात्रा और गुणवत्ता को बढ़ाता है। यौन शक्ति बढ़ाने में उपयोगी है।

☘️त्वचा के लिए अच्छा है। झुर्रियों को रोकता है। त्वचा के सूखापन को कम करता है और पराबैंगनी किरणों से बचाता है।

☘️बालों को मजबूत बनाता है।

☘️फटी ऎडियों को ठीक करता है।

☘️थकान को दूर करता है।

☘️ सूजन को कम करता है।

☘️उन लोगों के लिए भी उपयोगी है जो वजन बढ़ाना चाहते हैं।

🤔क्या इसका कोई दुष्प्रभाव है ❓❓
👉इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं है लेकिन पचने में भारी होने के कारण इसका अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।
👉कब्ज होने पर इसके सेवन से बचें।
👉अधिक मात्रा में इसका उपयोग करने से वजन बढ़ सकता है।
👉इसको खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए।

🤔इसका उपयोग कैसे करें?

✅इसके आटे की चपाती और हलवा बना कर ले सकते है।
✅इसको कच्चा या इसके फल को उबाल कर उसका गुदा खाने में उपयोग कर सकते है।

किसी भी रोग की चिकित्सा में चार घटक है जरूरी (चिकित्सीय चतुष्पाद)- चिकित्सक,रोगी,दवा और उपस्थाता।

चिकित्सा चतुष्पाद (चिकित्सा के 4 घटक )

🌷बीमारी दोष, धातु और मल के असंतुलन से होती है।
🌷इन्हे वापस संतुलन में लाने को ही चिकित्सा या इलाज कहते है।

🌷किसी भी बीमारी के इलाज में सिर्फ चिकित्सक की जिम्मेदारी नहीं होती है। चिकित्सक के अलावा 3 और महत्वपूर्ण पहलू होते है।

🌷इन 3 पहलुओं की अनुपस्थिति में एक महान चिकित्सक भी बीमारी का इलाज नहीं कर सकेगा।

4 घटक जो किसी भी बीमारी का प्रभावी ढंग से इलाज करने के लिए जिम्मेदार हैं, वे हैं –

  1. वैद्य या चिकित्सक
  2. द्रव्य (दवाई)
  3. उपस्थाता (परिचारक) (Attendant)
  4. रोगी (मरीज)

ये 4 घटक निम्न विशेषताएं रखते है –

  1. वैद्य या चिकित्सक
    वह सबसे महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि यह वह है जो अन्य 3 घटकों का उपयोग कर रहा है। वैद्य के पास निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

✅वैद्य का ज्ञानी होना आवश्यक है। उसे रोग के लक्षण, चिन्हों और उसके उपचार के बारे में सही ज्ञान होना चाहिए।
✅वैद्य को अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए।
✅उसे अपने कार्य में कुशल और अनुशासित होना चाहिए।
✅चिकित्सक को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से साफ होना चाहिए। उसे किसी भी नकारात्मक भावना जैसे लालच, घृणा या ईर्ष्या के प्रभाव में काम करना चाहिए।

  1. द्रव्य (दवाई)

✅दवा रोग के लिए उपयुक्त होनी चाहिए।
✅दवा को विभिन्न रूपों और खुराक में इस्तेमाल किया जा सकता है।
✅दवा में बीमारी के उपचार से संबंधित सभी आवश्यक गुणों का होना आवश्यक है।
✅ दवा आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए।

  1. परिचारक (Attendant)
    रोगी की देखभाल करने वाले व्यक्ति के पास निम्नलिखित गुणों को होना चाहिए –

✅ उसे नर्सिंग का ज्ञान होना चाहिए।
✅अपने कार्य में कुशल होना चाहिए।
✅ उसे मरीजों में प्रति दयालु और स्नेही होना चाहिए।
✅ उसे शारीरिक रूप से स्वच्छता का पालन करना चाहिए और नकारात्मक भावनाओं रहित होना चाहिए।

  1. रोगी
    रोगी वो है जिसके लिए उपरोक्त तीनों कार्य करते है और रोगी स्वयं भी अपनी बीमारी के इलाज के लिए जिम्मेदार होता है। निम्नलिखित गुणों वाले रोगी निश्चित रूप से स्वयं के शीघ्र स्वास्थ लाभ में उपरोक्त तीनों की मदद करते हैं- –

✅रोगी की याददाश्त अच्छी होनी चाहिए ताकि डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन कर सके, जैसे समय पर दवा लेना और फॉलोअप के लिए आना।
✅रोगी को आज्ञाकारी होना चाहिए। उसे चिकित्सक द्वारा दिए गए सुझावों (आहार, व्यायाम, परहेज़ या उपचारों) का पालन करना चाहिए।
✅रोगी को निडर और साहसी होना चाहिए।
✅रोगी के पास बीमारी के लक्षणों के बारे में बिना किसी अतिशयोक्ति और बिना कुछ छिपाए चिकित्सक को समझाने या बताने की क्षमता होनी चाहिए।

🌷इन सभी के निर्धारित प्रयासों से रोगी का स्वास्थ्य पुनः बहाल होता है।

🌷इन सभी घटकों में से चिकित्सक सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि चिकित्सक ही है जो अन्य घटकों का प्रभावी रूप से उपयोग करने के लिए जिम्मेदार है।

🌷 जैसे भोजन बनाने के लिए कई चीजों जैसे सब्जी, आटा, बर्तन और अग्नि का होना आवश्यक है लेकिन बिना कुशल बावर्ची के स्वादिष्ट भोजन नहीं पकाया जा सकता है।

🌷इसी तरह, एक चिकित्सक उपचार के इन तीन अन्य पहलुओं की सहायता से अपने गुणों का उपयोग करके सफलतापूर्वक रोगों का इलाज कर सकता है।

क्यों किसी विशेष भोजन या स्वाद की तीव्र इच्छा होती है?इसे कैसे नियंत्रित करे?

क्रेविंग या लालसा

🤔भोजन की लालसा क्या है ??

👉भोजन की लालसा कुछ विशेष स्वाद वाले भोजन को खाने की तीव्र इच्छा है। 🍟 🍲🍩

👉यह स्वाद में मीठा, खट्टा, नमक, कड़वा, तीखा और कसैला के प्रति हो सकती है।🙄

👉क्रेविंग शरीर का संदेश है कि वह विशेष स्वाद वाला भोजन चाहता है।
👉 यह जंक फूड,अल्कोहल, सिग्रेट ,चाय, कॉफी आदि के लिए भी हो सकती है।

🤔क्रेविंग का कारण क्या है ??

🌺 यह असंतुलन और कमी के कारण उत्पन्न होती है।✅
🌺मौसमी प्रभाव के कारण। 🌄
🌺उम्र और शरीर के प्रकार के प्रभाव के कारण।👍
🌺 रोग की स्थिति के कारण। 👍
🌺गर्भावस्था में यह सामान्य है।
🌺विभिन्न मानसिक स्थिति के कारण।

👉 अब ज्यादातर लोग क्रेविंग के महत्व को नही समझते तो इससे कैसे बचें यह भी नही समझ पाते, यह असंतुलित अग्नि और दोष को संतुलित करने की मांग का संकेत देने का एक शारीरिक तरीका है।

👉 क्रेविंग या किसी वस्तु की तलब हमें संतुलन बहाल करने के लिए मार्गदर्शन करती है लेकिन कभी-कभी यह रोग संबंधी स्थितियों के कारण भी उत्पन्न होती है जैसे कि कम चयापचय वाले व्यक्ति को मीठे और चाय, कॉफी की इच्छा होती हैं,मानसिक तनाव में शराब या सिगरेट की इच्छा हो सकती है।

👉क्रेविंग के प्रकार से असंतुलन के कारण की पहचान करने और संतुलन बहाल करने में मदद मिलती है।

👉क्रेविंग का अर्थ है कि शरीर को अधिक कोमल तत्वों, अधिक अग्नि तत्वों और अधिक वायु तत्वों की आवश्यकता है जो मौसम और व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है।

🌺 क्या आपने देखा है कि जब आप तनाव में होते हैं तो आप मीठे स्वाद की इच्छा होती हैं, जब आप आलस महसूस करते हैं तो आप मसालेदार भोजन की इच्छा करते हैं और जब आपको भूख लगती है तो आप नमकीन, कुरकुरे चीज खाना चाहते हैं।

🤔ऐसा क्यों होता है ??

👉तनाव, चिंता, उदासी, चिंता और असुरक्षा की स्थिति में शरीर में वात की वृद्धि होती है और उस शरीर में संतुलित करने के लिए स्वाभाविक रूप से मीठे स्वाद वाली चीजें जो भारी, पौष्टिक, सुखदायक और वात के गुणों के विपरीत संतुष्टि देने वाली होती की इच्छा होती हैं।🌷🌷
👉जब आप ऊर्जा में कमी महसूस करते हैं, आलस्य और उदास होते है तब कफ दोष असंतुलित हो जाता है और उस संतुलन के लिए शरीर मसालेदार भोजन या कैफीन पेय की मांग करता है। 🌷🌷🌷

👉भूख में पित्त और वात अधिक होता है, नमकीन स्वाद वात को अपनी तीखी और गर्म प्रकृति के साथ संतुलित करता है और भोजन के उचित पाचन के लिए भूख में सुधार करता है। 🌷🌷

🤔🤔यह पता होते भी को जंक फूड , चॉकलेट,केक , अल्कोहल, सिगरेट जेसी चीजे स्वास्थ्य के लिए हानि कारक उसकी इच्छा क्यों होती है??

👉आधुनिक तेज और तनावपूर्ण जीवन में वायु आसानी से असंतुलित हो जाती है, इसलिए बहुत से लोग इसे संतुलित करने के लिए चॉकलेट और अन्य अस्वास्थ्यकर चीजें खाते हैं, लेकिन अस्वास्थ्यकर भोजन में पोषण की कमी होती है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में खाने के बाद भी आपको असंतुष्टता रहती है और उन्हें आप जितना भी खा लो उतना ही और अधिक खाने की इच्छा होती है।🌼🌼🌼🌻

👉 किसी विशेष भोजन की इच्छा मौसम, दिन का समय, उम्र और शरीर के प्रकार पर भी निर्भर करती है जैसे बरसात के मौसम में हम तले हुए भोजन की, सर्दियों में मीठे और भारी भोजन की, गर्मियों में मीठे और हल्के भोजन की इच्छा होती हैं। ☘️☘️☘️☘️

👉वात व्यक्ति को सूखा, हल्का भोजन, पित्त मसालेदार और कफ व्यक्ति को भारी और मीठी चीजें पसंद होती हैं, लेकिन दोष को संतुलित करने के लिए उनके पास विपरीत प्रकृति की चीजें खानी चाहिए।🌱🌱🌱🌹

🌺अत: क्रेविंग को बलपूर्वक नियंत्रित करने के स्थान पर हमें इसके कारण को समझना चाहिए और शरीर को स्वस्थ के लिए हितकर मीठा, खट्टा, नमकीन और मसालेदार भोजन देना चाहिए। ✅👍

🤔हमे बरसात के मौसम में तली हुई भजिया या पकौड़े की इच्छा क्यू होती हैं ??
👉बारिश के मौसम में शरीर वात का प्रकोप होता है हो जाता है जिसे संतुलित करने के लिए तैलीय और नमकीन चीजों की इच्छा होती है इसलिए बरसात के मौसम में तला हुआ नाश्ता वास्तव में शरीर के लिए अच्छा होता है, लेकिन फिर से स्नैक्स तैयार करने में प्रयुक्त सामग्री और खपत की मात्रा के बारे में सावधान रहें।

🤔तो खाने के बाद मिठाई की इच्छा भी अच्छी है?

👉 नहीं, क्योंकि भोजन करने के बाद शरीर में कफ अधिक होता है और इस स्थिति में यदि कोई मीठा लेता है तो शरीर में कफ और अधिक हो जाता है जो अग्नि और पाचन को बिगड़ देता है, यह असंतुलित अग्नि सभी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन जाती है।

🤔खाना खाने के तुरंत बाद मीठी लालसा से बचने के लिए क्या किया जा सकता है ??

✅भोजन के बाद छाछ में भुना जीरा, सेंधा नमक और पुदीने के पत्ते मिलाकर सेवन करें।
✅सौंफ चबाए।
✅पान चबाए
✅ अत्यधिक मसालेदार भोजन से बचें
भोजन पर पूरा ध्यान लगाकर और कृतज्ञता के साथ भोजन करना।
✅शांतिपूर्ण व्यवहार करे।
✅मधुर संगीत सुनें
✅स्नान से पहले तेल की मालिश करें
✅नियमित व्यायाम
✅ प्राकृतिक सुखदायक मीठी सुगंध का प्रयोग करें।

🤔किस व्यक्ति को किसी विशेष भोजन की इच्छा या तलब नहीं होती है ??
✅संतुलित और संतुष्ट व्यक्ति विशेष स्वाद वाले भोजन की लालसा नहीं करते है।

🤔संतुलन और संतुष्टि कैसे प्राप्त करें ??
👉 आयुर्वेद के भोजन संबंधी नियम पालन करके।दिनचार्य, ऋतुचर्या और सद्वृत्ता का पालन करके।इनका पालन करने से शारीरिक और मानसिक दोष संतुलित रहते है।

मेथीदाना को भोजन में जरूर शामिल करें यह हॉर्मोन बैलेंस करता है ,मोटापा कम करता,दर्द से राहत देता और बहुत लाभ है इसके।

मेथीदाना (मेथी के बीज)

🍀मेथीदाना को संस्कृत में मीथिका के रूप में जाना जाता है जिसका अर्थ है मेधा या बुद्धिमत्ता में सुधार करने वाली। 😇

🍀मेथीदाना विटामिनों से भरपूर है जैसे विटामिन B6, विटामिन A, C, K और खनिज जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम, जस्ता, तांबा और पोटेशियम।

🍀यह स्वाद में कड़वा और प्रकृति में गर्म होता है। यह वात और कफ दोष को संतुलित करता है।

🍀मेथीदाना के उपयोग

👉कब्ज, सूजन, जठरशोथ में उपयोगी – इसके पाउडर को छाछ मे मिलाकर ले या पानी में रात भर मेथी के बीज को भिगोकर रखें और सुबह इस पानी को छान कर पी ले।

👉यह क्षुधानाश/अरुचि होने (Anorexia) में उपयोगी है – इसे चबाएं।

👉सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द, कटिस्नायुशूल (sciatica) और पक्षाघात(paralysis) में उपयोगी – इसे आंतरिक रूप से और साथ ही इसके बीज के गर्म पेस्ट का उपयोग बाहरी रूप से किया जा सकता है जिससे दर्द और सूजन को कम करने में मदद मिलती हैं।

👉ठंड के मौसम के कारण हुए बुखार में इसका उपयोग किया जाता है।

👉यह शरीर और मन की थकान से छुटकारा दिलाता है।

👉स्तनो के दूध में सुधार – स्तनपान कराने वाली मां को दिन में एक या दो बार 5 से 10 ग्राम इसके बीज का पाउडर या इससे बने लड्डू दें।
👉इसे प्रसव के बाद दिया जाना चाहिए क्योंकि यह माँ बनी महिला के शरीर में वायु को नियंत्रित करता है। दर्द को रोकता है,वजन को बढ़ने से रोकता है। माहवारी को सामान्य करता है। गर्भाशय को साफ और मजबूत करता है।

👉रक्तवसा (Cholesterol) के स्तर को कम करता है।

👉मोटापा, Fatty Liver, अवटु-अल्पक्रियता (Hypothyroidism), PCOD और गांठ (Fibroid) में उपयोगी।

👉मधुमेह – इसका 5 ग्राम पाउडर या रात भर पानी में भिगोए हुए बीज सुबह खाली पेट लें।

👉 बालों के विकास में उपयोगी।
तैलीय खोपड़ी (Oily Scalp) और रूसी (Dandruff) होने पर उपयोगी – इसके बीजों का पेस्ट या इस पेस्ट को एलोवेरा जेल के साथ मिलाकर खोपड़ी (Scalp) पर लगाए और इसे लगाने के 30 मिनट के बाद धो ले। इसके पत्तों का रस रूसी (Dandruff) में भी लगाया जा सकता है।

👉गले में खराश- इसके बीज को पानी में उबालें, इसे छानें और इस पानी को गरारा (Gargle) के लिए इस्तेमाल करें।

👉बार-बार पेशाब आने की समस्या के उपचार में मददगार।

👉यह कफ दोष के कारण होने वाले त्वचा के विकारों में उपयोग करने के लिए अच्छा है – इसका आंतरिक रूप से उपयोग करें, बाहरी स्तर पर इसका पेस्ट भी लगाएं।

मेथी का उपयोग कैसे करें??

👉 इसके बीजों या पत्तियों की घी के इस्तेमाल के साथ सब्जी भी बनाई जा सकती है।
👉 इसके पानी का उपयोग किया जा सकता है।
👉 इसके बने लड्डू का उपयोग वात विकारों में और प्रसव के बाद किया जा सकता है।

खुराक/मात्रा (Dose) – 3-5 ग्राम बीज पाउडर।

इससे कब बचना है ??

मेथीदाना या मेथी के बीज शक्ति में गर्म होते है। इसलिए इसे निम्नलिखित स्थितियों में इसे टाला जाना चाहिए –
❌ शरीर में अत्यधिक गर्मी होने पर।
❌ दस्त (Diarrhea) में।
❌रक्तस्राव विकारों जैसे नाक से खून बहना और माहवारी के समय भारी मात्रा में रक्तस्राव।
✅बच्चों के लिए सुरक्षित।
✅ गर्भावस्था के दौरान इसका उपयोग
कम मात्रा में करें।

पेया (चावल का सूप)- बीमार हो और कुछ हल्का खाना है तो इस आयुर्वेदिक रेसिपि को खाए।

☘️ जब भी हम पचने में हल्के खाने के बारे में सोचते है तो खिचड़ी या दलिया नाम ही दिमाग में आता हैं लेकिन आयुर्वेद में ऐसी कई व्यंजन/खाना बनाने की विधि (Recipes) हैं जो पचने में हल्की, पोषण देने वाली और पुनः शक्ति हासिल करने में मददगार हैं।

☘️ इन्हीं में से एक व्यंजन (Recipe) है पेया।

☘️ यह निम्नलिखित परिस्थितियों में उपयोगी होती है।

✅ जब कोई बीमार हुआ ही या बीमारी से उबर रहा हो।

✅ कमजोर पाचन क्रिया।
✅ कम भूख लगना।
✅ दस्त।
✅ कब्ज।
✅ अत्यधिक प्यास लगना और मुंह सूखना।
✅ बुखार, थकान और कमजोरी।
✅ वात विकार
✅ बूढ़े लोग
✅ बच्चे

👉 पेया तैयार करने की विधि बहुत ही सरल और आसान है। इसे दो तरह से तैयार किया जा सकता है –

  1. चावल (1 भाग) लेकर इसे पानी (6 भाग या 14 भाग) में डालकर ठीक से पकाएं। यह अर्ध-ठोस संगति (Semisolid Consistency) का होना चाहिए।
    इसमें काली मिर्च, सेंधा नमक, धनिया, सोंठ, घी और अन्य जड़ी बूटियाँ आवश्यकतानुसार मिलाई जा सकती हैं। 🌸🌺

2.दूसरी विधि में 800 मिलीलीटर पानी लें और इसमें अदरक, काली मिर्च, धनिया और जीरा (सभी 5 ग्राम) मिलाएं फिर पानी को आधा (400 मिलीलीटर) होने तक उबाले तत्पश्चात इस पानी को छान लें और चावल (लगभग 50 ग्राम) को पकाने के लिए इस काढ़े/पानी का उपयोग करें।👍

👉 इसे ताज़ा ही बनाए और थोड़ा गर्म ही इस्तेमाल करे।

👉 यह संगति में मोटी (Thick in Consistency) नहीं होनी चाहिए।

👉 यह जानने के लिए कि आप किन जड़ी-बूटियों का उपयोग कर सकते हैं आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करे। वह आपकी आवश्यकता के अनुसार आपको सुझाव देंगे।

अश्वगंधा, बहु उपयोगी आयुर्वेदिक औषध जो स्वास्थ्य को बढ़ती है ।

☘️अश्वगंधा आयुर्वेद की सबसे प्रसिद्ध, शक्तिशाली और उपयोगी जड़ी बूटी है।

☘️अश्वगंधा की जड़ों का उपयोग दवाओं में किया जाता है।

☘️अश्वगंधा के आयुर्वेदिक गुण

👉इसमें कटु, तिक्त और कषाय रस होते है।

👉यह स्निग्धा, लघु (पचने में हल्की) होती है।

👉शक्ति में गर्म

☘️अश्वगंधा के स्वास्थ्य लाभ

✅अश्वगंधा एक रसायन है। यह कायाकल्प करती है। पोषण प्रदान करती है। समय पूर्व उम्र बढ़ने से रोकती है। जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) और पौरुष में सुधार करती है। यह एक स्वास्थ्य टॉनिक के रूप में कार्य करती है।

✅यह रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करती है। इसका उपयोग बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए घी के साथ किया जा सकता है।

✅यह मांसपेशियों की ताकत में सुधार करता है, जो उन लोगों के लिए अच्छा है जो बॉडी बिल्डिंग कर रहे हैं और नियमित जिमिंग कर रहे हैं। यह बाजार में उपलब्ध किसी भी पेय या पूरक (Suppliment) से बेहतर है।

✅अश्वगंधा का उपयोग वजन बढ़ाने और वजन कम करने दोनों में किया जाता है।

✅दिमाग को शांत करके अनिद्रा में मदद करता है। बेहतर नींद आने में सहायक है।

✅यह दिल के लिए अच्छी है। यह हृदय की मांसपेशियों को ताकत देती है। तनाव को कम करके रक्तचाप (Blood Pressure) को कम करती है। रक्तवसा (Cholesterol) के स्तर को कम करती है।

✅यह यकृत (Liver) के लिए अच्छी होती है।

✅अश्वगंधा शरीर में रक्त परिसंचरण (Blood Circulation) में सुधार करती है। सुन्नता (Numbness) को दूर करने में मदद करती है।

✅गठिया, सूजन से राहत दिलाने में सहायक।

✅शरीर के दर्द, थकान और रक्ताल्पता (Anemia) जैसी समस्यायों के उपचार में इसका प्रयोग किया जाता है।

✅मधुमेह के रोगियों के लिए अश्वगंधा बहुत फायदेमंद होती है।

✅इसका उपयोग सांस संबंधी समस्याओं विशेष रूप से अस्थमा में किया जाता है।

✅श्वित्र (leucoderma), घाव भरने, खुजली और अन्य त्वचा संबंधी समस्याओं में उपयोगी।

✅यह महिला प्रजनन प्रणाली के विकारों में उपयोगी होती है। यह गर्भाशय की मांसपेशियों को शक्ति देती है। Dysmenorrhoea, Leucorrhoea के उपचार में मदद करती है। बांझपन के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है। बार-बार गर्भपात होने से रोकती है।

✅यह पुरुषों की यौन समस्याओं में उपयोगी होती है। यह शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता में सुधार करती है।

✅यह मस्तिष्क की कार्यक्षमता में सुधार करके स्मृति और बुद्धिमत्ता में सुधार करती है।

✅यह वात को शांत करती है इसलिए चिंता, अवसाद, Parkinson, लकवा और अन्य वात विकारों के लिए सबसे अच्छी दवाओं में से एक है।तंत्रिका टॉनिक के रूप में कार्य करती है और नसों की पीड़ा को शांत करती है।

🤔इसका उपयोग कैसे करें?

👉इसे पाउडर या गोलियों के रूप में लिया जा सकता है।

👉इसे घी या दूध के साथ डॉक्टर द्वारा परामर्श अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है।

👉इसका उपयोग आवश्यकता के अनुसार अन्य जड़ी बूटियों के साथ मिलाकर भी किया जाता है।

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